वीरयोद्धाओं के सम्मान का प्रतीक हैं राष्ट्रीय पर्व

भरथना,इटावा। माँ भारती के चरणों में नमन व राष्ट्र की सुरक्षा-सम्मान की खातिर अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले वीरयोद्धाओं को श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ।

तनुज श्रीवास्तव निवासी बृजराज नगर भरथना का कहना है कि गणतंत्र दिवस की पावन बेला के शुभ अवसर पर एक बात विचारणीय व स्मरणीय है कि हम-हमारे समाज का प्रत्येक व्यक्ति पौराणिक परम्पराओं का प्रतीक होली,दीपावली,रक्षाबन्धन समेत वेलेंटाइन डे, फ्रेण्डशिप डे,रोज डे,प्रपोज -डे,चॉकलेट-डे समेत सैकडों दिवसों को बडे हर्षोल्लास व उमंगता के साथ प्रतिवर्ष अपने परिवारीजनों-इष्टमित्रों के साथ बडी धूमधाम से मनाते हैं। बहुत से ऐसे दिवस जिनका हमारे वास्तविक जीवन में कोई अस्तित्व व महत्व नहीं है। फिर भी हम उन्हें सर्वाधिक मान्यता व महत्ता प्रदान करते हैं। शायद हमारी स्मरण शक्ति इस बात पर प्रकाश नहीं डाल पाती, कि जिन राष्ट्रीय पर्वों स्वाधीनता दिवस,गणतंत्र दिवस, शहीद दिवस,गाँधी जयन्ती जैसे महत्वपूर्ण उत्सवों को मनाने में हम अधिकांशतः संकोच करते हैं,जबकि इन्हीं पर्वों व योद्धाओं के शौर्य पराक्रम का परिणाम है,जो हम होली-दीवाली जैसे उत्सवों को खुशी-खुशी मनाने के लिए स्वतंत्र है। इसलिए हमें पूर्ण सत्यनिष्ठा व राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर राष्ट्र व वीरों से जुडी मुख्य तिथियों व राष्ट्रीय पर्वों को हर्षोल्लास के साथ मनाना चाहिये तथा स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी इस नैतिक दायित्व के प्रति जागरूक व सजग करना चाहिये।

उन्होंने कहा कि अगर देखा जाये,तो सामाजिक दृष्टिकोंण के आधार पर यह एक बडा चिन्तनीय विषय है,क्योंकि राष्ट्र भावना के प्रति हम उतने सजग नहीं है, जितना हमें होना चाहिये। हम अपनी सुख-सुविधाओें की पूर्ति के लिए इतने व्यस्त हो गये कि जिन योद्धाओं ने हमारी व देश की सुरक्षा-सम्मान के लिए अपने पारिवारिक मोहमाया-बन्धनों की परवाह किये बिना कुर्बानी देकर अपनी वीरगाथा की एक-एक पंक्ति इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से हमेशा-हमेशा के लिए अंकित कर दी है। विश्व पटल पर राष्ट्र को पहचान दिलाने वाले ऐसे वीरसपूतों के जन्मदिवसों व पुण्य तिथियों का हम स्मरण नहीं कर पाते।

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