जसवंतनगर में 166वीं मैदानी रामलीला की तैयारी में जुटे कमेटी के सदस्य और प्रशासन 

इटावा, जसवंतनगर: इटावा के जसवंतनगर में इस वर्ष 166वीं मैदानी रामलीला का भव्य आयोजन किया जा रहा है। 1860 में शुरू हुई यह ऐतिहासिक रामलीला अपनी अनूठी परंपराओं और भव्यता के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है।

 

​इस साल भी रामलीला की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। जिला प्रशासन रामलीला समिति को पूरा सहयोग दे रहा है और हर संभव मदद का प्रयास किया जा रहा है। इस वर्ष के कार्यक्रम का शुभारंभ 20 सितंबर को होगा, जिसमें समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे।

रामलीला की अनूठी पहचान

​जसवंतनगर की यह रामलीला किसी मंच पर नहीं, बल्कि पूरे शहर की सड़कों पर खेली जाती है। दर्शक और कलाकार एक-दूसरे के बेहद करीब होते हैं, जिससे यह अनुभव और भी खास बन जाता है। साल 2005 में यूनेस्को ने इसे “विश्व की सर्वोत्तम क्षेत्र की रामलीला” के रूप में मान्यता दी थी। यह रामलीला मॉरीशस, त्रिनिदाद, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी बहुत लोकप्रिय है।

प्रमुख कार्यक्रम और परंपराएं

​रामलीला के दौरान कई मुख्य कार्यक्रम होते हैं, जिनमें गणेश बारात, धनुष भंग, राम बारात, सीता हरण, लंका दहन, रावण दहन और भरत मिलाप शामिल हैं। इस साल कार्यक्रमों में एक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया जाएगा।

​यहां की सबसे अनोखी परंपरा रावण दहन की है। रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसे गिराया जाता है। लोगों का मानना है कि रावण की लकड़ी का टुकड़ा घर में रखने से बुरी आत्माओं और भय से मुक्ति मिलती है। रामलीला की आकृतियों को बंगाल के प्रसिद्ध कारीगरों ने खास किस्म की मिट्टी, सीमेंट और टेराकोटा से बनाया है।

हीरालाल गुप्ता, अध्यक्ष, रामलीला समिति ने बताया “जिला प्रशासन का पूरा सहयोग मिल रहा है। हम इस साल भी दर्शकों के लिए एक अविस्मरणीय आयोजन की तैयारी कर रहे हैं।”आज रामलीला मैदान में जिला प्रशासन के अधिकारी पहुंचे जहां विभिन्न मामलों पर कमेटी के सदस्यों से चर्चा हुई।

अजेंद्र गौर, उपाध्यक्ष, रामलीला समिति: “हमारी रामलीला की परंपराएं इसे खास बनाती हैं। रावण को गिराने की परंपरा लोगों की आस्था का प्रतीक है।”इस रामलीला को भव्य बनाने के लिए विभिन्न विशेष कार्यक्रमों का आयोजन बढ़ाया गया है।

अनुराग गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार: “जसवंतनगर की रामलीला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत है जो पीढ़ियों से चली आ रही है।”मैंने अपने जीवन काल मे रामलीला के बहुत से समाचार प्रकाशित किए है। हर वर्ष कुछ नया देखने को भी मिलता है। यूनेस्को के अनुसार यह रामलीला पहले रामलीला है जिसको यूनेस्को में दर्ज किया गया।

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